राजकीय

पुरुषोत्तम कहां है

प्रभू रामचंद्र तो बस गये पर मर्यादा कहां है 

हर जगह जुटी जो भीड पर पुरुषोत्तम कहां है

चंदे की होती है चोरी तो सत्य वचन कहां है

चोरी पर राजनीति भारी भक्ती वंदन कहां है 

कैकयी मंथरा का हट भरत वचन कहां है 

असुरशक्ती का करे विनाश वह हवन कहां है 

हर जगह जो भीड पुरुषोत्तम कहां है

मायावी राक्षस बनते कांचनमृग जटायु कहां है 

प्रतिदिन रावण करता हरण लक्ष्मणरेखा कहां है

सीता से छलकपट शब्दों से होता है अपमान

प्रभू मुद्रिका ले जाये हाथ ऐसा हनुमान कहां है

हर जगह जूट गई भीड पर पुरुषोत्तम कहां है…

बिना सोच हाथो मे लिये है उग्र जो पत्थर

उसी पत्थर पर लिखो श्री राम के दो अक्षर 

होगा चमत्कार पत्थर से पत्थर जुडकर 

बनेगा रामसेतू साथ देगा अथांग सागर 

जानकी तो मुक्त होगी पर हृदय में राम कहां है 

प्रभू राम तो बस गये पर मर्यादा कहां है 

हर जगह जूट गई भीड पर पुरुषोत्तम कहां है

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नमस्कार,

 माझ्या ब्लॉगला भेट दिल्याबद्दल धन्यवाद. आपल्या भोवती घडणाऱ्या घटनातून, अनुभवातून आपल्या सर्वांच्या मनात अनेक पडसाद, भावना उमटतात. त्या फक्त शब्दबद्ध करणे हा अल्पसा प्रयत्न आहे.  या प्रवासात आपण सहप्रवासी आहात याचा आनंद आहे. आपण आपली प्रतिक्रिया ब्लॉगवर जरूर नोंदवा.

नवविवाहित दांपत्याच्या स्वप्नांना अलगद उलगडत संसार सजवणारा दहा कवितांचा संग्रह आहे …. सुखचित्र नवे

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